नेता प्रतिपक्ष ने कहा- आदिवासी समाज को प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, संवैधानिक अधिकार चाहिए; 2027 की जनगणना में अलग आदिवासी धर्म कोड का कॉलम सुनिश्चित करने की मांग..
भोपाल/धार@अमीन खान
9 अगस्त को मनाए जाने वाले विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आदिवासी समाज को जोहार की शुभकामनाएं देते हुए जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर अपनी आवाज बुलंद की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज केवल प्रकृति के बीच रहने वाला समुदाय नहीं, बल्कि प्रकृति को अपनी जीवनशैली और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मानकर जीने वाला समाज है।
विश्व आदिवासी दिवस पर जारी अपने संदेश में सिंघार ने आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं, सामुदायिक जीवन और प्रकृति के साथ उसके संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के लिए वन, पर्वत और नदियां केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी आस्था, परंपरा और पूर्वजों से जुड़े हुए हैं।
‘प्रकृति ही हमारा ईश्वर, सह-अस्तित्व ही हमारा धर्म’
उमंग सिंघार ने कहा कि आदिवासी जीवन-दर्शन प्रकृति और सह-अस्तित्व पर आधारित है। समाज में सामुदायिक भावना को सबसे बड़ी ताकत बताते हुए उन्होंने कहा कि यहां व्यक्तिगत हित से ऊपर समाज और पूरे समुदाय की भलाई को महत्व दिया जाता है।
उन्होंने आदिवासी लोकनृत्य, लोकगीत और पारंपरिक पर्वों का उल्लेख करते हुए कहा कि मांदल की थाप पर होने वाले पारंपरिक नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि प्रकृति, बारिश, मिट्टी और फसलों के साथ आदिवासी समाज के गहरे जुड़ाव की अभिव्यक्ति हैं।
भाजपा सरकार की नीतियों पर लगाए गंभीर आरोप..
नेता प्रतिपक्ष ने अपने संदेश में मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार पर आदिवासी हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार बड़े मंचों से ‘आदिवासी गौरव’ की बात करती है, जबकि दूसरी ओर जल, जंगल और जमीन से जुड़े आदिवासी अधिकारों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सिंघार ने आरोप लगाया कि आदिवासियों के संसाधनों और जमीन पर कॉर्पोरेट हितों को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, ये आरोप नेता प्रतिपक्ष की राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में हैं।
वन अधिकार कानून को लेकर उठाए सवाल..
सिंघार ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के क्रियान्वयन को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि आदिवासियों के वन अधिकार दावों के बड़ी संख्या में आवेदन खारिज किए गए हैं और पात्र लोगों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जिन जंगलों और जमीनों से आदिवासी समुदाय का पीढ़ियों पुराना संबंध रहा है, वहां उनके अधिकारों को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
पैसा कानून के अधिकारों को लेकर भी सवाल..
नेता प्रतिपक्ष ने पैसा कानून को लेकर भी अपनी बात रखी। उनका आरोप है कि कानून लागू होने के बावजूद ग्राम सभाओं को उनके वास्तविक अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं और निर्णय प्रक्रिया में नौकरशाही का हस्तक्षेप बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका और संवैधानिक अधिकारों को मजबूत किया जाना जरूरी है।
आदिवासी धर्म कोड की मांग..
उमंग सिंघार ने 2027 में प्रस्तावित जनगणना के संदर्भ में आदिवासी धर्म कोड को लेकर भी मांग उठाई। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान, परंपराएं और प्रकृति आधारित जीवन मूल्य हैं, इसलिए जनगणना में आदिवासी समाज के लिए अलग धर्म कोड का कॉलम सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह मांग लंबे समय से उठाई जाती रही है और 2027 की जनगणना में इस विषय पर स्पष्ट व्यवस्था की जानी चाहिए।
शिक्षा, रोजगार और संवैधानिक अधिकार की मांग..
सिंघार ने कहा कि आदिवासी समाज को केवल प्रतीकात्मक सम्मान की आवश्यकता नहीं है। समाज को जमीन का मालिकाना हक, बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, युवाओं के लिए रोजगार और जल-जंगल-जमीन पर संवैधानिक अधिकार चाहिए।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति और पहचान को केवल सरकारी आयोजनों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उनके अधिकारों और विकास के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
टंट्या मामा, बिरसा मुंडा और रानी दुर्गावती का किया स्मरण..
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर उमंग सिंघार ने आदिवासी समाज के प्रमुख नायकों टंट्या मामा, बिरसा मुंडा और रानी दुर्गावती का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि इन महान व्यक्तित्वों के संघर्ष और स्वाभिमान की विरासत आज भी आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा देती है।
‘अपनी माटी का सौदा नहीं होने देंगे’
अपने संदेश के अंत में नेता प्रतिपक्ष ने आदिवासी समाज से अपनी पहचान, भाषा, संस्कृति और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपनी माटी और अधिकारों का सौदा नहीं करेगा और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखेगा।
उन्होंने अपने संदेश का समापन ‘जय जोहार, जय आदिवासी’ के उद्घोष के साथ किया।
नोट: वन अधिकार अधिनियम, पेसा कानून, जनगणना और आदिवासी धर्म कोड से संबंधित उपरोक्त आरोप/मांगें उमंग सिंघार के जारी संदेश में व्यक्त राजनीतिक दावे और मांगें हैं। इन्हें सरकारी रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि उनके बयान के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।






























