अलौकिक स्थान है बेंट टापू बेंट टापू का स्वरूप है गजपृष्ठ गज पृष्ठ पहाड़ पर साधना करने का विशेष महत्व है अंतरराष्ट्रीय ज्योतिषाचार्य पं. प्रशांतजी व्यास ने कहा।
धरमपुरी@सय्यद जफर अली
आज हम पतित पावनी सिध्दि की दात्री मां नर्मदा के तट बेंट संस्थान धरमपुरी पर आए हैं। यह अद्भुत, अलौकिक स्थान है। पूर्व में यह टापू 6 किलोमीटर लंबा था लेकिन कटाव के कारण मात्र 3 किलोमीटर में रह गया है। बेंट टापू भगवान श्रीबिल्वामृतेश्वर महादेव का दिव्य अलौकिक स्थान है। अमरकंटक और खम्बात की खाड़ी के बीच बेंट टापू ही ऐसा स्थान है जहां भगवान शिव का स्थान और महर्षि दधीचि की तपस्थली है। हमारे धर्म शास्त्रों में लिखा है कि शिवलिंग के पास में उपासना करने से अनन्य पुण्य फल प्राप्त होते हैं। यहां टापू के दोनों तरफ माँ नर्मदा बहती है। मां नर्मदा की गोद में टापू स्थित है। शास्त्रों के अनुसार ऐसे स्थान पर साधना करने से बहुत पुण्य प्राप्त होता है। नर्मदा के कंकर शंकर है जिन्हें बाणलिंग कहा जाता है। बेंट टापू के चारों तरफ नर्मदा नदी में यहां कितने कंकर शंकर है इसकी कल्पना हम नहीं कर सकते। इनको ना कोई गिन सकता है, ना कोई बता सकता है कि बाणलिंग के रूप में कितने शिवलिंग यहां पर उपस्थित है।
उक्त बात गत दिनों नीमच मध्यप्रदेश से आए अंतर्राष्ट्रीय ज्योतिषाचार्य पं. प्रशांतजी व्यास ने धरमपुरी में नर्मदा के मध्य स्थित बेंट टापू के महत्व पर प्रकाश डालते हुए चर्चा में कही।धरमपुरी नगर से सटे नर्मदा किनारे स्थित शीतलामाता घाट से नाव से होकर पं. प्रशांत व्यास नर्मदा नदी के मध्य स्थित बेंट टापू पहुँचे। सर्वप्रथम बेंट टापू स्थित भगवान श्रीबिल्वामृतेश्वर महादेव मंदिर पहुँचकर अंतर्राष्ट्रीय ज्योतिषाचार्य पं. प्रशांतजी व्यास ने भगवान श्रीबिल्वामृतेश्वर महादेव के दर्शन पूजन किए। इसके पश्चात श्रद्धालुओं व पत्रकारों से चर्चा में अंतर्राष्ट्रीय ज्योतिषाचार्य पं. प्रशांतजी व्यास ने बताया कि किसी की तपस्या स्थली पर भी साधना करने का बहुत महत्व है। बेंट टापू महर्षि दधीचि की भी तपस्थली है। तो यह तपस्थली अपने आप में एक तीर्थ है। यहां पर नर्मदा तीर्थ स्थान है। श्रीबिल्वामृतेश्वर महादेव तीर्थ स्थान है। दधीचि ऋषि की तपस्थली है। पहाड़ यानी कि गज पृष्ठ की भूमि पर साधना करने का महत्व है। बेंट टापू पहाड़ रूप में हाथी की पीठ के अनुसार भी है। पहले के ऋषि, राजा पहाड़ों पर जाकर तपस्या करते थे, किसी वन को जाते थे, तीर्थ स्थान पर जाते थे या रमणीय स्थान पर जाते थे। ये समस्त विशेषता बेंट टापू में समाहित है। इसलिए बेंट टापू पर जो भी सिध्दि की जाती है उसका पुण्य मिलता है और मुझे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिला है।
इस संबंध में पं. प्रशांत व्यास ने बताते हुए कहा कि वर्ष 1998 में जब हम बेंट टापू पर साधना करने आए थे तो हमारे मन में एक ही भावना थी कि हम हमारे वेदों की संस्कृति को पूरे विश्व में पहुंचाएं। इसी भाव के निमित्त हमने बेंट टापू पर साधना की थी और हमारे पुरुषार्थ सफल हुआ और आज हम देश दुनिया में भारत की संस्कृति का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। हमें भगवान की कृपा से जिम्मेदारी भी ऐसी मिली है जिसके जरिए हम रुद्राक्ष सेवा संस्था चला रहे हैं। जनकल्याण की भावना से निःशुल्क साहित्य वितरण भी कर रहे हैं। भगवान श्रीबिल्वामृतेश्वर महादेव और मां नर्मदा की कृपा से यह कार्य पूर्ण हुआ है। बेंट स्थान पर आकर साधना करें, दर्शन करें, भगवान आपका भी कल्याण करेंगे। इस अवसर पर पत्रकार व कवि विवेक जगताप, समाजसेवी चेतन जोशी, पं. रितेश जोशी, नर्मदा समग्र कार्यकर्ता सुधीर शर्मा, पूर्व पार्षद नानाभाई कटुकिया, पार्षद प्रतिनिधि विक्रम वर्मा आदि उपस्थित थे।





























