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आज मां सरस्वती एवं आध्य आचार्य धर्मदास जी की नगरी में जैन समाज में संथारा पूर्वक श्री राजमलजी विनायक्या का समाधि मरण हुआ । ये श्री अभय सुनील प्रदीप विनायक्या के पिता थे । जैन समाज की इस दिवंगत आत्मा ने तीन दिन पूर्व ही समाज के साधुओं के समक्ष प्रतिज्ञा ले ली थी कि अब मैं मृत्यु आने तक अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगा और ना ही सांसारिक सुख सुविधाओं का उपयोग करूंगा । जैन समाज में इसी को संथारा कहते हैं ।
धार@साबिर खान fm
इस प्रतिज्ञा के बाद राजमलजी जैन के दर्शनों हेतु रात दिन समाज के लोग आने लगे और नवकार मंत्र का अखंड जाप शुरू कर दिया ।
संपूर्ण संथारा सफलता पूर्वक डा दीपक नाहर की चिकित्सा निगरानी में तीन दिन में संपन्न हो गया और अंततः बुधवार की शाम गोधूलि बेला में डा दीपक नाहर ने दिवंगत आत्मा की मृत्यु की घोषणा की ।
हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने दिवंगत आत्मा श्री राजमालजी विनायकया को कपड़े के रत्न से सुसज्जित डोली में किले के पीछे स्थित निवास से देवीजी श्मशान तक पैदल धार्मिक नारे लगाते हुए ले गए जहां समाज के श्री रमेश ओस्तवाल द्वारा जैन श्लोकों और गुरु मंत्र द्वारा लकड़ी रहित चिता में परिजनों द्वारा अग्नि दिलवाई ।
डोल का रूट था..
अन्नपूर्णा कालोनी किले के पीछे से घोड़ा चौपाटी से मोहन टॉकीज से उटावद दरवाजा से जवाहर मार्ग एम.जी. रोड से राजबाड़ा से ओसवाल स्थानक भवन से कालिका मार्ग से मुक्ति धाम
अग्निसंस्कार के बाद मुक्तिधाम में जैन समाज द्वारा गुणानुवाद सभा आयोजित की गई जिसमें अशोक जैन, सुनील नाहर ,शांतिलाल कोठारी , जितेंद्र जैन,प्रकाश जैन ,हर्षा रूनवाल,समीक्षा विनायक्या, द्वारा दिवंगत देवलोकी आत्मा के जीवन चक्र पर संबोधन दिया । इस गुणानुवाद सभा का संचालन रमेश ओस्तवाल ने किया।

इसके पश्चात संपूर्ण श्वेतांबर जैन श्री संघ की गौतम प्रसादी पार्श्वनाथ मंदिर, महात्मा गांधी मार्ग पर हुई
क्या होता है संथारा ?
मानव जीवन का अंतिम मोड़ या जीवन की अंतिम संध्या संथारा हैं ।संथारा करने वाले साधक में आत्म बल होता हैं ।वह शांति पूर्वक शरीर को छोड़ने की योजना बनाता है ,उसमें न आवेश होता हैं न तड़पन होती हैं ,कषाय मंद होते है और सबके प्रति क्षमा भाव होता हैं ।
जीवन भर की साधना का अंतिम फ़ल होने से तथा भविष्य मे भी इसका सुखदायी फ़ल आत्मा के साथ चलने से संथारा आत्मा के लिए महोत्सव हैं । ऐसा ही प्रतिज्ञा लेकर संथारा जैन समाज के आचार्य श्री धर्मदासजी महाराज द्वारा जैन मूल्यों की रक्षा करने एवं आत्म कल्याण के उद्देश्य से आज से लगभग तीन सौ पचास वर्ष पूर्व किया था जो लगभग आठ दिन बाद पूर्ण हुआ था । जिस पाट पर अचार्य श्री ने प्राण त्यागे थे वो आज भी जैन स्थानक बनियावाडी में दर्शनार्थ रखा हुआ है।
Video
https://youtu.be/Ho5JlTpR5G4


































